गोहाना / सोनीपत । राष्ट्रीय वायरल हेपेटाइटिस दिवस के अवसर पर मंगलवार को बीपीएस राजकीय महिला चिकित्सा महाविद्यालय, खानपुर कलां में जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम बी-ब्लॉक स्थित मेडिसिन ओपीडी परिसर में आयोजित हुआ, जिसमें चिकित्सकों, स्वास्थ्यकर्मियों, विद्यार्थियों एवं मरीजों को वायरल हेपेटाइटिस बी और सी के प्रति जागरूक किया गया।
महाविद्यालय की कार्यकारी निदेशक डॉ. स्वर्ण कौर ने मुख्य अतिथि के रूप में कार्यक्रम में शिरकत की। चिकित्सा अधीक्षक डॉ. संजीव सिंगला भी कार्यक्रम में उपस्थित रहे। इस अवसर पर मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. नवतेज सिंह तथा बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. मनोज रावल भी विशेष रूप से मौजूद रहे।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय वायरल हेपेटाइटिस नियंत्रण कार्यक्रम (एनवीएचसीपी) एवं एआरटी सेंटर की नोडल अधिकारी डॉ. सोनिका लांबा ने कहा कि काला पीलिया (वायरल हेपेटाइटिस बी एवं सी) लंबे समय तक बिना किसी स्पष्ट लक्षण के शरीर में रह सकता है। समय पर जांच और उपचार नहीं होने पर यह लीवर सिरोसिस, लीवर फेलियर और लीवर कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है।
उन्होंने लोगों से सुरक्षित और जांचे हुए रक्त का ही उपयोग करने, सुई, सिरिंज, ब्लेड, रेजर, नेल कटर तथा टूथब्रश जैसी व्यक्तिगत वस्तुएं साझा न करने, टैटू या पियर्सिंग के लिए केवल स्टरलाइज्ड उपकरणों का प्रयोग करने तथा असुरक्षित यौन संबंधों से बचने की अपील की। उन्होंने कहा कि यदि परिवार में किसी सदस्य को हेपेटाइटिस बी है तो अन्य सदस्यों की जांच और टीकाकरण अवश्य कराया जाना चाहिए।
डॉ. सोनिका लांबा ने बताया कि प्रत्येक गर्भवती महिला की एचबीएसएजी (हेपेटाइटिस बी) जांच कराना अत्यंत आवश्यक है। यदि गर्भवती महिला संक्रमित पाई जाती है तो नवजात शिशु को जन्म के 24 घंटे के भीतर हेपेटाइटिस बी का टीका तथा आवश्यकता अनुसार एचबीआईजी दिया जाना चाहिए, जिससे संक्रमण का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि अधिकांश मामलों में उचित चिकित्सकीय सलाह के साथ संक्रमित मां भी अपने शिशु को स्तनपान करा सकती है।
उन्होंने 18 वर्ष से अधिक आयु के सभी लोगों, विशेषकर जिनका कभी रक्त चढ़ा हो, डायलिसिस हुआ हो, बार-बार इंजेक्शन लगे हों अथवा जो स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े हों, उन्हें हेपेटाइटिस बी एवं सी की जांच कराने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि समय पर पहचान होने पर हेपेटाइटिस सी का प्रभावी उपचार उपलब्ध है, जबकि हेपेटाइटिस बी को दवाओं और नियमित निगरानी के माध्यम से नियंत्रित रखा जा सकता है।