जब शिक्षा और स्वास्थ्य बाजार बन जाये : व्यवस्था के आइनें मे लोकतंत्र
कभी शिक्षा को ज्ञान का प्रकाश माना जाता था और चिकित्सा को सेवा का सर्वोच्च धर्म। विद्यालय ज्ञान के मंदिर कहलाते थे और अस्पताल जीवन बचाने वाले आश्रय स्थल। गाँव की पाठशालाओं से निकलकर छात्र प्रशासनिक अधिकारी, शिक्षक, वैज्ञानिक और राष्ट्रनिर्माता बनते थे तथा सरकारी अस्पताल सीमित संसाधनों के बावजूद आमजन के भरोसे का केंद्र हुआ करते थे। लेकिन समय के साथ यह भरोसा धीरे-धीरे कमजोर होता गया और उसकी जगह निजी विद्यालयों, कोचिंग संस्थानों तथा निजी अस्पतालों ने ले ली। आज स्थिति यह है कि शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों ही क्षेत्रों में एक ऐसी विशाल मंडी विकसित हो चुकी है जहाँ जरूरतें भी बिकती हैं और उम्मीदें भी। प्रश्न यह है कि क्या यह केवल समय की मांग है या फिर सार्वजनिक व्यवस्था की कोई ऐसी कमजोरी, जिसने इस बाजार को जन्म दिया है? स्वतंत्रता के बाद भारत ने विकास के अनेक सोपान तय किए। देश विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हुआ, तकनीकी क्षेत्र में नई ऊँचाइयाँ हासिल कीं और डिजिटल क्रांति का नेतृत्व किया। किंतु यदि किसी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति का मूल्यांकन उसके नागरिकों की शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के आधार पर किया जाए, तो तस्वीर पूरी तरह संतोषजनक नहीं दिखाई देती।
आज एक सामान्य परिवार की सुबह बच्चे की स्कूल फीस की चिंता से शुरू होती है और रात किसी अस्पताल के संभावित खर्च की आशंका के साथ समाप्त होती है। यह केवल आर्थिक दबाव नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का मौन दस्तावेज है जो अपने नागरिकों को बुनियादी अधिकारों के लिए बाजार की ओर देखने को विवश करती है। शिक्षा के क्षेत्र में भारत ने निश्चित रूप से महत्वपूर्ण प्रगति की है। ASER (Annual Status of Education Report) 2024 के अनुसार देश में 6 से 14 वर्ष आयु वर्ग के 98 प्रतिशत से अधिक बच्चे विद्यालयों में नामांकित हैं, जो स्वतंत्र भारत की एक बड़ी उपलब्धि है। लेकिन इसी रिपोर्ट का दूसरा पक्ष यह भी बताता है कि सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों का प्रतिशत 2022 के 72.9 प्रतिशत से घटकर 2024 में लगभग 66.8 प्रतिशत रह गया है, जबकि निजी विद्यालयों में नामांकन बढ़ा है। यह केवल एक सांख्यिकीय परिवर्तन नहीं, बल्कि अभिभावकों के विश्वास में आए बदलाव का संकेत है। जब सीमित आय वाला परिवार भी अपने बच्चे को निजी विद्यालय में पढ़ाने के लिए अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाता है, तो यह स्पष्ट होता है कि वह बेहतर शिक्षा की तलाश में है। शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी UDISE+ 2024-25 रिपोर्ट के अनुसार देश में शिक्षकों की संख्या पहली बार 1.01 करोड़ के पार पहुँची है, लेकिन इसी रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि लगभग 1.04 लाख विद्यालय ऐसे हैं जहाँ केवल एक शिक्षक पूरी शैक्षिक व्यवस्था संभाल रहा है तथा हजारों विद्यालय ऐसे हैं जहाँ विद्यार्थियों का नामांकन अत्यंत कम या शून्य है। यही वह स्थिति है जिसने निजी विद्यालयों और कोचिंग संस्थानों को फलने-फूलने का अवसर दिया।
आज विद्यालय की पढ़ाई को पर्याप्त नहीं माना जाता। स्कूल के बाद कोचिंग और कोचिंग के बाद विशेष प्रशिक्षण का एक अंतहीन सिलसिला शुरू हो जाता है। इंजीनियरिंग, मेडिकल, प्रशासनिक सेवाओं और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग लगभग अनिवार्य हो चुकी है। यदि विद्यालयों में दी जा रही शिक्षा ही पर्याप्त होती, तो क्या देशभर में हजारों करोड़ रुपये का कोचिंग उद्योग खड़ा हो पाता? यह प्रश्न केवल शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता पर नहीं, बल्कि उसकी विश्वसनीयता पर भी खड़ा होता है। स्वास्थ्य क्षेत्र की कहानी भी कम मार्मिक नहीं है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा (National Health Accounts) 2022-23 के अनुसार भारत में स्वास्थ्य पर सरकारी व्यय पिछले एक दशक में लगभग तीन गुना बढ़ा है। इसके परिणामस्वरूप नागरिकों की जेब से सीधे होने वाला स्वास्थ्य खर्च (Out-of-Pocket Expenditure) 2013-14 के 64.2 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में 43.4 प्रतिशत रह गया है। यह निश्चित रूप से सुधार का संकेत है, लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ यह है कि आज भी देश में स्वास्थ्य पर होने वाले कुल खर्च का लगभग 43 प्रतिशत हिस्सा सीधे नागरिकों को अपनी जेब से वहन करना पड़ रहा है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के सर्वेक्षण बताते हैं कि गंभीर बीमारी की स्थिति में लाखों परिवारों को अपनी बचत खर्च करनी पड़ती है या कर्ज लेना पड़ता है।
कई बार बीमारी केवल व्यक्ति के शरीर को नहीं, बल्कि पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति को भी बीमार कर देती है। सरकारी अस्पतालों की लंबी कतारों में खड़ा व्यक्ति केवल इलाज की प्रतीक्षा नहीं करता, वह व्यवस्था की संवेदनशीलता की भी प्रतीक्षा करता है। जब उसे समय पर चिकित्सक नहीं मिलता, आवश्यक जांच उपलब्ध नहीं होती या उपचार में अनावश्यक विलंब होता है, तब वह निजी अस्पतालों की ओर रुख करता है। निजी अस्पताल आधुनिक सुविधाएँ तो देते हैं, लेकिन अक्सर ऐसी कीमत पर जो आम नागरिक की वर्षों की जमा पूंजी को निगल जाती है। यही कारण है कि आज स्वास्थ्य और शिक्षा दोनों क्षेत्रों में निजी संस्थानों का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। यह कहना आसान होगा कि इसके लिए केवल वर्तमान सरकार जिम्मेदार है या केवल पूर्ववर्ती सरकारें दोषी हैं, किंतु सच्चाई इससे कहीं अधिक व्यापक है। स्वतंत्रता के बाद से विभिन्न सरकारों ने शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में अनेक योजनाएँ शुरू कीं। विद्यालयों की संख्या बढ़ी, अस्पताल बने, स्वास्थ्य बीमा योजनाएँ लागू हुईं और बजट में वृद्धि भी हुई। फिर भी दशकों बाद सरकारी विद्यालय और अस्पताल उस स्तर तक नहीं पहुँच सके जहाँ आम नागरिक बिना किसी संकोच के उन पर पूर्ण विश्वास कर सके। इसलिए यह समस्या किसी एक सरकार, दल या कालखंड की नहीं, बल्कि दशकों की नीतिगत प्राथमिकताओं, प्रशासनिक कमियों और सामाजिक उदासीनता का परिणाम है। अर्थशास्त्र का एक सरल सिद्धांत है कि जहाँ आवश्यकता और उपलब्धता के बीच दूरी बढ़ जाती है, वहाँ बाजार जन्म लेता है। निजी विद्यालय, कोचिंग सेंटर, अस्पताल और डायग्नोस्टिक संस्थान उसी दूरी की उपज हैं। उन्होंने उस मांग को पूरा किया जिसे सार्वजनिक व्यवस्था पूरी तरह पूरा नहीं कर सकी। इसलिए समस्या निजी क्षेत्र का अस्तित्व नहीं है।
समस्या तब पैदा होती है जब नागरिक के पास विकल्प नहीं, केवल मजबूरी रह जाती है। यदि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल ऊँची फीस पर उपलब्ध हो और बेहतर इलाज केवल आर्थिक सामर्थ्य का विषय बन जाए, तो सामाजिक समानता की अवधारणा कमजोर पड़ने लगती है। किसी भी लोकतंत्र की सफलता उसकी संसद, उसकी अर्थव्यवस्था या उसके राजमार्गों से नहीं मापी जाती, बल्कि इस आधार पर मापी जाती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिक के लिए कितना संवेदनशील है।
जब एक किसान का पुत्र भी उसी गुणवत्ता की शिक्षा प्राप्त कर सके जो किसी महानगर के महंगे विद्यालय में मिलती है और जब एक मजदूर का परिवार भी उसी सम्मान और दक्षता के साथ उपचार प्राप्त कर सके जो किसी बड़े निजी अस्पताल में उपलब्ध है, तभी सामाजिक न्याय की अवधारणा सार्थक होगी। समाधान निजी संस्थानों के विरोध में नहीं, बल्कि सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था को इतना मजबूत बनाने में है कि नागरिक उन्हें मजबूरी नहीं बल्कि विश्वास के साथ चुनें। सभ्यता की पहचान उसकी ऊँची इमारतों, चमकदार बाजारों और आर्थिक उपलब्धियों से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिक को कितना सम्मान, सुरक्षा और अवसर प्रदान करती है।
यदि शिक्षा के लिए कोचिंग और इलाज के लिए निजी अस्पताल अनिवार्यता बन जाएँ, तो यह केवल बाजार की सफलता नहीं बल्कि व्यवस्था के सामने खड़ा एक गंभीर प्रश्न भी है। समय की मांग है कि शिक्षा और स्वास्थ्य को पुनः सेवा और अधिकार के रूप में स्थापित किया जाए, न कि केवल उपभोग की वस्तु के रूप में। क्योंकि जिस समाज में ज्ञान बिकने लगे और स्वास्थ्य खरीदना पड़े, वहाँ विकास की चमक के पीछे व्यवस्था की एक गहरी छाया भी मौजूद रहती है।
Bhartiya Samvad