विश्व पृथ्वी दिवस विशेष: बढ़ता तापमान और बिगड़ता मौसम दे रहा खतरे की चेतावनी

विश्व पृथ्वी दिवस विशेष: बढ़ता तापमान और बिगड़ता मौसम दे रहा खतरे की चेतावनी
योगेश कुमार गोयल

ग्लोबल वार्मिंग, अनियंत्रित विकास और संसाधनों के दोहन से गहराता पर्यावरण संकट

हर वर्ष 22 अप्रैल को मनाया जाने वाला विश्व पृथ्वी दिवस इस बार ऐसे समय में आया है, जब पूरी दुनिया बढ़ते तापमान और तेजी से बिगड़ते मौसम के कारण गंभीर पर्यावरणीय संकट का सामना कर रही है।

वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन को लेकर कई बड़े सम्मेलन—दोहा, कोपेनहेगन और कानकुन—आयोजित किए गए, लेकिन इसके बावजूद ठोस और प्रभावी कदम अभी तक नदारद हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक विकास, औद्योगिकीकरण और संसाधनों की अंधाधुंध दौड़ के कारण पर्यावरण संरक्षण के प्रयास पीछे छूटते जा रहे हैं।

पिछले कुछ वर्षों में प्रकृति ने कई बार अपने बदलते स्वरूप से चेतावनी दी है। कहीं भीषण आंधी-तूफान, कहीं सूखा तो कहीं बेमौसम बारिश—ये सभी घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि प्राकृतिक संतुलन तेजी से बिगड़ रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है, जिसका असर ध्रुवीय क्षेत्रों से लेकर मैदानी इलाकों तक साफ देखा जा रहा है।

रिपोर्टों के अनुसार, उत्तरी ध्रुव के तापमान में असामान्य वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि भारत समेत कई देशों में अप्रैल माह का तापमान अब 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंचने लगा है। मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि आने वाले तीन दशकों में तापमान में 5 डिग्री तक की वृद्धि हो सकती है, जिससे सूखा, जंगलों में आग और जल संकट जैसी समस्याएं और बढ़ेंगी।

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इसका मुख्य कारण मानवीय गतिविधियां हैं—जैसे पेट्रोल-डीजल के अत्यधिक उपयोग से बढ़ती कार्बन डाईऑक्साइड, वनों की अंधाधुंध कटाई और बढ़ती जनसंख्या। पेड़-पौधे जहां कार्बन डाईऑक्साइड को अवशोषित कर संतुलन बनाए रखते हैं, वहीं तेजी से घटते वन क्षेत्र इस संतुलन को बिगाड़ रहे हैं।

ब्रिटेन के प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग ने भी चेतावनी दी थी कि यदि ऊर्जा खपत और जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो भविष्य में पृथ्वी के अस्तित्व पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है।

बढ़ते तापमान का एक बड़ा प्रभाव ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ के तेजी से पिघलने के रूप में सामने आ रहा है, जिससे समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है और तटीय शहरों के डूबने का खतरा बढ़ गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में धरती का बड़ा हिस्सा सूखे और रेगिस्तान में तब्दील हो सकता है।

ऐसे में विश्व पृथ्वी दिवस केवल औपचारिकता बनकर न रह जाए, इसके लिए जरूरी है कि सरकारों के साथ-साथ आम नागरिक भी पर्यावरण संरक्षण के प्रति गंभीर हों। पेड़ लगाना, प्रदूषण कम करना और प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग जैसे छोटे-छोटे प्रयास ही भविष्य में बड़े बदलाव ला सकते हैं।

यदि हम अभी भी नहीं संभले, तो प्रकृति का यह असंतुलन मानव जीवन के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है।